नेशनल हैंडलूम डे (National Handloom Day) पर चौंकाने वाली रिपोर्ट: हिमाचल के इन तीन जिलों में दम तोड़ रही है हथकरघा विरासत

हर साल 7 अगस्त को देश भर में नेशनल हैंडलूम डे (National Handloom Day) मनाया जाता है। इसका मकसद हमारे पारंपरिक बुनकरों और उनके हुनर को सम्मा...

नेशनल हैंडलूम डे (National Handloom Day) पर चौंकाने वाली रिपोर्ट: हिमाचल के इन तीन जिलों में दम तोड़ रही है हथकरघा विरासत
फ़ाइल फोटो
नेशनल हैंडलूम डे (National Handloom Day) पर चौंकाने वाली रिपोर्ट: हिमाचल के इन तीन जिलों में दम तोड़ रही है हथकरघा विरासत

हर साल 7 अगस्त को देश भर में नेशनल हैंडलूम डे (National Handloom Day) मनाया जाता है। इसका मकसद हमारे पारंपरिक बुनकरों और उनके हुनर को सम्मान देना है। लेकिन हिमाचल प्रदेश से इस मौके पर एक बेहद चिंताजनक खबर सामने आ रही है।

मीडिया रिपोर्ट्स और आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, हिमाचल प्रदेश के तीन बड़े जिलों—बिलासपुर, सिरमौर और ऊना में अब एक भी पंजीकृत हथकरघा बुनकर (registered handloom weaver) नहीं बचा है। यह इस बात का संकेत है कि इन क्षेत्रों से सदियों पुरानी विरासत धीरे-धीरे पूरी तरह गायब हो रही है।

हिमाचल प्रदेश में हथकरघा का संकट: क्या कहते हैं सरकारी आंकड़े? (Himachal Handloom Statistics)

हिमाचल प्रदेश उद्योग विभाग की लेटेस्ट रिपोर्ट (latest report) के अनुसार, पूरे राज्य में कुल 13,211 पंजीकृत हथकरघा कारीगर (registered artisans) बचे हैं। इनमें से सबसे ज्यादा बुनकर कुल्लू जिले में हैं। कुल्लू को हिमाचल के हैंडलूम का गढ़ माना जाता है, जहाँ अकेले 7,958 कारीगर पंजीकृत हैं।

आइए नजर डालते हैं जिलों के हिसाब से पंजीकृत कारीगरों के प्रमुख आंकड़ों पर:

  • कुल्लू (Kullu): 7,958 पंजीकृत कारीगर
  • मंडी (Mandi): 2,342 पंजीकृत कारीगर
  • चंबा (Chamba): 1,112 पंजीकृत कारीगर
  • बिलासपुर, सिरमौर और ऊना: 0 पंजीकृत कारीगर

इन आंकड़ों से साफ है कि जहाँ कुल्लू और मंडी जैसे पहाड़ी क्षेत्रों में कुल्लू शॉल (Kullu Shawls) जैसी पारंपरिक कलाओं के कारण उद्योग अभी भी जिंदा है, वहीं मैदानी और निचले जिलों से हथकरघा का अस्तित्व खत्म होने की कगार पर है। इसकी पूरी जानकारी आप मूल खबर (Original News Source) पर पढ़ सकते हैं।

विशेषज्ञों की राय और मुख्य विश्लेषण (Expert Opinion & Key Insights)

उद्योग और सांस्कृतिक मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि तीन जिलों में बुनकरों की संख्या शून्य होने के पीछे कई बड़े कारण हैं। सबसे बड़ा कारण पावरलूम (powerloom) मशीनों का बढ़ता उपयोग है, जो हाथ से बने कपड़ों की तुलना में सस्ते और तेजी से तैयार होते हैं। इससे पारंपरिक बुनकरों को मार्केट में उचित दाम नहीं मिल पाता।

इसके अलावा, कच्चे माल (raw material) की बढ़ती कीमतें और युवा पीढ़ी का इस काम से दूरी बनाना भी एक मुख्य वजह है। आज की युवा पीढ़ी बेहतर कमाई के लिए शहरों की ओर पलायन (migration to cities) कर रही है। हथकरघा उद्योग में कम मार्जिन और सीमित बाजार होने के कारण वे इस पुश्तैनी काम को जारी नहीं रखना चाहते।

सरकारी प्रयास और भविष्य की राह (Government Schemes & Future of Handloom)

राज्य और केंद्र सरकार लगातार पारंपरिक बुनकरों की मदद के लिए नई योजनाएं (government schemes) पेश करती रही हैं। इनमें बुनकरों को रियायती दरों पर कर्ज देना, ट्रेनिंग देना और उनके उत्पादों को पहचान दिलाने के लिए जीआई टैग (Geographical Indication - GI Tag) दिलाना शामिल है।

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर इस कला को बचाना है, तो हथकरघा उत्पादों को डायरेक्ट डिजिटल मार्केट (digital market) और ई-कॉमर्स (e-commerce platforms) से जोड़ना होगा। जब तक बुनकरों को उनके काम की सही कीमत और सीधा मुनाफा नहीं मिलेगा, तब तक इस कला को नई पीढ़ी के लिए आकर्षक बनाना नामुमकिन होगा।

डिस्क्लेमर (E-E-A-T Editorial Verification): यह रिपोर्ट हिमाचल प्रदेश उद्योग विभाग के आधिकारिक पंजीकरण डेटा और प्रतिष्ठित क्षेत्रीय समाचारों पर आधारित है।

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